इतिहास

गुरुकुल छात्रावास में निवासरत छात्रों के लिए जिनशासन की दिनचर्या से रूबरू कराने के लिए जिनमन्दिर एवं जिनबिम्ब की आवश्यकता महसूस की गई। श्रावक के षट आवश्यकों से परिचय कराने हेतु जिनप्रतिमा एवं मंदिर जी की आवश्यकता महसूस की जाने लगी। यदि जिनप्रतिमा ही न हो तो छात्रों को जिनेन्द्र अभिषेक, पूजन, प्रक्षाल आदि कैसे सिखाया जाये? इसी विकल्प की पूर्ति हेतु सन् 1953 में कृषिपंडित श्रीमंत ऋषभ सेठ जी एवं सकल दिगंबर जैन समाज के सहयोग से एक चैत्यालय की स्थापना की गई और देवाधिदेव 1008 भगवान पार्श्वनाथ के भाववाही जिनबिम्ब को स्थापित किया गया।

कुछ समय पश्चात् सम्पूर्ण सकल दिगम्बर जैन समाज के सहयोग से संस्था की अदभुत छटा को बिखेरने हेतु सन् 1975 में 35 फुट ऊँचे एक गगनचुम्बी मानस्तम्भ का निर्माण कराया गया। जिसकी वेदी प्रतिष्ठा आध्यात्मिक सत्पुरुष पूज्य गुरुदेव श्री कानजी स्वामी की मंगलकारी उपस्थिति पंडित मानिकचंद जी चंवरे (कारंजा), पण्डित जगनमोहनलाल जी, (कटनी) वालों के निर्देशन में पंडित दयाचंद जी शास्त्री के प्रतिष्ठाचार्यत्व में सम्पन्न हुई। इस महोत्सव को ऐतिहासिक बनाने के लिए आर्थिक सहयोग अजमेर के कुबेर श्री भागचंद जी सोनी का प्राप्त हुआ। तब से लेकर कुछ माह पूर्व तक इसकी धवल छटा चतुर्दिक बिखरती रही परन्तु 14 जून 2020 को आकाशीय बिजली गिरने से यह क्षतिग्रस्त हो गया था तत्पश्चात शीघ्र ही नवीन मानस्तम्भ का कार्य प्रारंभ हुआ जो कि बनकर तैयार है, यह मानस्तम्भ प्रत्येक आगन्तुक को गुरुकुल के धार्मिक वातावरण से परिचय कराता है।

जैसे जैसे समय व्यतीत हुआ वैसे वैसे छात्रों की बढ़ती संख्या, दर्शनार्थियों की बढ़ती संख्या एवं चैत्यालय जी के जीर्णशीर्ण होने के कारण श्रीमंत सेठ धर्मेन्द्र कुमार जी की प्रेरणा से एवं श्री सिंघई आलोकप्रकाश जी के निर्देशन में चैत्यालय के स्थान पर नवीन शिखरयुक्त द्विमंजिल दिगम्बर जैन मंदिर का निर्माण कार्य प्रारंभ हुआ और अंततोगत्वा मन्दिर निर्माण पूर्ण होने पर 19 फरवरी 2002 को अध्यात्म सरोवर के राजहंस संत शिरोमणि आचार्यश्री 108 विद्यासागर जी महाराज की परम शिष्या 105 आर्यिका पूर्णमति माता जी के सानिध्य में सम्पूर्ण विधि-विधान के साथ वेदी प्रतिष्ठा पूर्वक श्रीजी को नवीन जिनमन्दिर में स्थापित किया गया। इस मन्दिर का निर्माण लाल पत्थर से होने के कारण इसे लाल मन्दिर भी कहा जाने लगा। श्री लाल मंदिर में छोटे बड़े कुल 23 शिखर हैं तथा इस मंदिर जी में कमलाकार मूलवेदी पर भगवान श्री 1008 पार्श्वनाथ विराजमान हैं तो वहीं एक तरफ शासननायक भगवान महावीर स्वामी तो दूसरी ओर भगवान आदिनाथ विराजमान हैं।

इस मंदिर की अदभुत कला को देखने दूर-दूर से दर्शनार्थी आते है। यह लाल मंदिर बीना-कटनी रेल्वे पर खुरई रेल्वे स्टेशन के पास है। यह इस मंदिर की विशेषता ही कहिए कि ट्रेन में बैठा हुआ यात्री भी सरलता से देवदर्शन कर सकता है। मंदिर जी में भूतल पर स्वाध्याय भवन है, जिसमें जिनवाणी संग्रह है, जहाँ साधर्मी भाई-बहिन स्वाध्याय, तत्वचिंतन, सामायिक आदि कार्य कर सकते हैं।

मानस्तंभ

गुरुकुल की स्थापना के समय चैत्यालय निर्माण कर चिंतामणि पार्श्वनाथ भगवान की मनोहरी प्रतिमा को स्थापित किया गया तब से यहाँ प्रतिदिन जिनेन्द्र अभिषेक, प्रक्षाल, देवपूजा, विधान आदि सामाजिक गतिविधियाँ प्रारम्भ हो गईं। समय ने धर्म की कीर्ति को फैलाने के उद्देश्य से संस्था को फाल्गुन कृष्ण सप्तमी, सोमवार, 4 मार्च 1975 के दिन एक और मांगलिक कार्य करने का सौभाग्य दिया। इस दिन सम्पूर्ण खुरई नगर दुल्हन की तरह सजाया गया था, हजारों की संख्या में जनसमुदाय गुरुकुल में था, हेलिकॉप्टर के माध्यम से पुष्पवर्षा लोगों के लिये आकर्षण का केंद्र था, साथ ही दिगंबर जैन समाज के वरिष्ठ विद्वानों की श्रृंखला में सर्वश्री माणिकचाँद जी चवरें, पंडित जगनमोहनलाल जी शास्त्री (कटनी), पंडित देवकीनंदन जी शास्त्री, पंडित पन्नालाल जी साहित्याचार्य, पंडित दयाचंद जी, पंडित रमेश जी शास्त्री आदि अनेक विद्वान अपनी गरिमामयी उपस्थिति से गुरुकुल प्रांगण को सुशोभित कर रहे थे। इन सभी वरिष्ठ विद्वानों के बीच में एक व्यक्तित्व ऐसा भी था जिसकी उपस्थिति पाकर सम्पूर्ण नगर हर्षित था और वह थे आध्यात्मिक सत्पुरुष पूज्य गुरुदेव श्री कानजी स्वामी।

4 मार्च 1975 के दिन अवसर था समवशरण के प्रतीक स्वरूप, जिन्हें देखकर मानियों का मान खंडित हो जाता है ऐसे मानस्तंभ की वेदी प्रतिष्ठा का। जिसमें भगवान महावीर स्वामी एवं भगवान चंद्रप्रभ स्वामी की वीतरागी भाववाही जिनबिम्ब को स्थापित किया जाना था। एक ओर जिनवाणी के उपासकों की मंगल उपस्थिति तो दूसरी तरफ श्रेष्ठीवर्य साहू श्री शांतिप्रसाद जी जैन (दिल्ली), सेठ भागचंद जी सोनी (अजमेर), श्री नंदनलाल जी जैन (बीना), कृषिपण्डित श्रीमंत ऋषभकुमार जी सेठ, श्री भैयालाल जी गुरहा जैसे लक्ष्मीपुत्र जलतरंगवत धन का सदुपयोग करने के लिए लालायित थे।

भगवान पार्श्वनाथ का चैत्यालय तो पहले से ही दर्शनार्थियों के लिए धर्म आराधना का केंद्र बना हुआ था और अब मानस्तंभ की स्थापना से दिगदिगंत में जिनशासन की प्रभावना का कार्य प्रारंभ होने वाला था। पश्चिम मध्य रेलवे लाइन पर स्थापित होने के कारण प्रतिदिन हजारों दर्शनार्थी ट्रेन में बैठे-बैठे ही इस मानस्तंभ में विराजमान जिनबिम्बों के दर्शन कर पुण्य संचय करेंगें। सड़क मार्ग से भी गुजरने वाले राहगीर मानस्तंभ के माध्यम से ही दिगंबर धर्म की महिमा से अभिभूत होंगे, इस उद्देश्य के साथ मानस्तम्भ वेदी प्रतिष्ठा का एक और अध्याय जुड़ गया। लगभग 39 फुट उत्तुंग मानस्तम्भ केवल खुरई नगर के लिए ही नहीं अपितु संपूर्ण बुंदेलखंड की लिए एक गौरव स्थल बन गया था। समाज के प्रत्येक परिवार ने अपना आर्थिक सहयोग प्रदान करके इस मानस्तंभ के निर्माण से लेकर प्रतिष्ठा तक के कार्य में संपूर्ण सहयोग प्रदान किया था, गौरव का विषय तो यह है कि केवल जैन समाज नहीं अपितु जैनेतर साधर्मियों ने भी अपना सहयोग प्रदान करके पुण्य संचय किया था।

तब से लेकर 14 जून 2020 तक इस मानस्तम्भ में विराजमान जिनबिम्बों के दर्शन सहस्त्रों साधर्मियों ने भक्ति भाव के साथ किए। 14 जून 2020 तक इसलिए क्योंकि यही वह दिन था जिस दिन लगातार तीन बार आकाशीय बिजली गिरने के कारण मानस्तम्भ क्षतिग्रस्त हुआ एवं चारों जिनबिम्ब खंडित हो गए। 20 जून 2020 को मातृसंस्था श्री पार्श्वनाथ ब्रह्मचर्याश्रम जैन गुरुकुल ट्रस्ट के न्यासियों ने यह निर्णय लिया कि शीघ्र ही पुनः नवीन मानस्तम्भ का निर्माण होगा एवं वेदी प्रतिष्ठा पूर्वक जिनबिम्ब विराजमान होंगे। अंततोगत्वा गुरुकुल न्यासियों के द्वारा श्री दिगम्बर जैन कुन्दकुन्द कहान तीर्थसुरक्षा ट्रस्ट, मुम्बई एवं श्री कुन्दकुन्द कहान पारमार्थिक ट्रस्ट, मुम्बई को संयुक्त रूप से यह सौभाग्य प्रदान किया गया और निश्चित हुआ कि बेदाग दुग्धवत सफेद जिसकी विशेषता है ऐसे वियतनाम के मार्बल से मानस्तम्भ का निर्माण होगा, 45 वर्ष पूर्व इसका निर्माण हुआ था इसलिए नवीन मानस्तम्भ की ऊंचाई भी 45 फुट रहेगी, जिसकी तीनों कटनियों और चारों दिशाओं में मुनिराजों की आराधना के प्रतीक शाश्वतपर्व दसलक्षण धर्म के चित्रों को उकेरा जाएगा ‘‘जो अपने आप में भूतो न भविष्यति की सूक्ति को चरितार्थ करने वाला होगा’’। जिसमें चारों दिशाओं में भगवान पाश्र्वनाथ की भाववाही प्रतिमाएं विराजमान होंगीं। जिनको विराजमान करने का सौभाग्य सर्वश्री अनंतभाई अमोलकराय सेठ एवं श्री निमेशभाई केतनभाई शाह परिवार, मुम्बई (पूर्व दिशा), श्री प्रदीपकुमार राहुलकुमार रीतेशकुमार चौधरी परिवार (चरखा बीड़ी वाले), खुरई (पश्चिम दिशा), एडवोकेट श्री राजकुमार जैन परिवार, खुरई (उत्तर दिशा) एवं श्री देवचंद विजयकुमार संजयकुमार जैन परिवार (विजय फाउंड्री), खुरई ने प्राप्त किया है। यह भावना व्यक्त करके मानो इन परिवारों का सौभाग्य जाग गया है।